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Sex Education ( यौन शिक्षा )

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Sex Education ( यौन शिक्षा )

यौन  शिक्षा (सेक्स एजुकेशन )

सेक्स का सही ज्ञान उतना ही जरूरी है, जितना कि दूसरे विषयों का ज्ञान । हमारे देश में मेडिकल कॉलेज तक में सेक्स एजुकेशन नहीं दिया जाता, जिसके परिणामस्वरूप सेक्स संबंधी अंधविश्वास, भ्रांतियां और इससे जुड़ी कई समस्याएं उत्पन्न होती है।

सेक्स एजुकेशन (Sex Education) क्या है-

व्यक्ति के शरीर की यौन संरचना, यौन क्रियाएं, यौन प्रजनन, शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव, सुरक्षित यौन संबंध, प्रेगनेंसी, माहवारी और बर्थ कंट्रोल के बारे में बच्चों और किशोर लड़के लड़कियों को बताना सेक्स एजुकेशन कहलाता है।

 भारतीय समाज में आमतौर पर घरों में बच्चों को यौन शिक्षा नहीं दी जाती है लेकिन बच्चों के साथ बढ़ते यौन उत्पीड़न और किशोरावस्था में बलात्कार की घटनाओं के कारण बच्चों को जागरूक करने के लिए स्कूलों में सेक्स एजुकेशन देने की शुरूआत की गयी है। कई स्थानों पर बच्चो को नुक्कड़ नाटक और विभिन्न तरह के कार्यक्रम आयोजित करके सेक्स एजुकेशन दी जाती है।

यदि सही उम्र में यौन शिक्षा दी जाए तो किशोर मातृत्व, अनचाहे गर्भ, यौन अपराध, गुप्त रोग तथा एड्‍स जैसी गंभीर और लाइलाज बीमारियों से बचा जा सकता है। साथ ही सेक्स संबंधी समस्याएं जैसे- हस्तमैथुन से उत्पन्न अपराधबोध, नपुंसकता, स्वप्नदोष, धातु रोग और लिंग के आकार को लेकर विभिन्न भ्रांतियों से भी आसानी से मुक्त हुआ जा सकता है।

बदलते परिवेश और युवाओं की जिज्ञासाओं को देखते हुए 9वीं-10वीं कक्षा से सेक्स एजुकेशन दिया जा सकता है क्योंकि 13-14 वर्ष की उम्र में लड़के-लड़कियों में शारीरिक परिवर्तन होते हैं। 
सही यौन शिक्षा मिलने से लड़के-लड़कियां अपने शारीरिक परिवर्तनों से घबराएंगे नहीं, नकारात्मक रूप से नहीं सोचेंगे और शार‍ीरिक परिवर्तनों को सहज रूप से लेकर जिम्मेदार नागरिक बनेंगे।

दुर्भाग्य से हमारे देश में सेक्स संबंधी वैज्ञानिक व तार्किक पहुलओं पर खुलेआम चर्चा नहीं होती।                    इस विषय पर बात करना भी वर्जित माना गया, जबकि गुप्तांग भी शरीर के वैसे ही अंग हैं, जैसे ‍कि अन्य अंग । 

यौन समस्याओं का कारण भले ही मानसिक हो अथवा शारीरिक, लेकिन एक बात की कमी सभी व्यक्तियों में समान रूप से पाई गई है, वह है यौन शिक्षा का अभाव ।

सेक्स एजुकेशन न होने से व्यक्ति सेक्स संबंधी अनेक मानसिक परेशानियों से घिर जाता है, जो कि वास्तव में होती ही नहीं हैं। आधी-अधूरी जानकारी के कारण व्यक्ति ऐसी समस्या को स्वयं विकराल बनाकर आत्मग्लानि का शिकार हो जाता है।

अक्सर माता-पिता बच्चों को सेक्स के बारे में यह सोचकर कोई जानकारी देना ज़रूरी नहीं समझते कि उन्हें भी तो उनके माता-पिता ने इस बारे में कुछ नहीं बताया था  तो क्या इससे उनके सेक्स जीवन पर कोई बुरा प्रभाव पड़ा,  फिर आज तो ज़माना इतना एडवांस हो गया है कि उम्र से पहले ही बच्चों को सब कुछ पता चल जाता है फिर अलग से कुछ बताने-समझाने की ज़रूरत ही क्या है,  लेकिन अक्सर हमारी यही सोच बच्चों के लिए हानिकारक साबित होती है

हम अपने बच्चों को सेक्स शिक्षा दें या न दें, उन्हें अश्‍लील पत्र-पत्रिकाओं, टीवी, फ़िल्म, इंटरनेट, यहां तक कि शौचालय की दीवारों से भी सेक्स संबंधी ऐसी कई आधी-अधूरी व उत्तेजक जानकारियां मिल ही जाती हैं, जो उन्हें गुमराह करने के लिए काफ़ी होती हैं. उस पर उनका चंचल मन अपने शरीर की अपरिपक्वता को देखे-जाने बिना ही सेक्स को लेकर कई तरह के प्रयोग करने के लिए मचलने लगता है और कई मामलों में वे इसे हासिल भी कर लेते हैं और नतीजा  अनेक शारीरिक-मानसिक बीमारियां, आत्मग्लानि, पछतावा  और पढ़ाई, करियर का नुक़सान सो अलग । 

लेकिन हमारी विडंबना ये है कि 21वीं सदी के जेट युग में जीते हुए भी अभी तक हम ये नहीं तय कर पा रहे हैं कि हम अपने बच्चों को सेक्स एज्युकेशन दें या न दें और दें तो कब और कैसे ? जबकि अब समय आ गया है कि सेक्स एजुकेशन दें या न दें से परे हम ये सोचें कि कैसे और किस उम्र से बच्चों को सेक्स शिक्षा दी जाए । 

 सेक्स एजुकेशन क्यों ज़रूरी है-

यूं तो हमारे न बताने पर भी बच्चों को दोस्तों, पत्र-पत्रिकाओं या फिर इंटरनेट के ज़रिए सेक्स की जानकारी मिल ही जाती है, फिर भी क्यों हमें उन्हें सेक्स एजुकेशन देना चाहिए, आइए जानते हैं-
1-  उन्हें अपने शरीर के बारे में संपूर्ण जानकारी हो सके.
2- वे लड़का-लड़की दोनों के ही साथ कंफ़र्टेबल होकर बातचीत व व्यवहार कर सकें.
3- उनके साथ या किसी अन्य के साथ हो रहे सेक्सुअल शोषण, बलात्कार आदि को समझ सकें और उसे रोकने में सहयोग कर सकें.
4- किशोरावस्था में होनेवाले शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सेक्सुअल बदलावों को जानने-समझने के लिए तैयार हो सकें.
5- आगे चलकर जब उनके मन में सेक्स की भावना उत्पन्न हो, तो उसे हेल्दी तरी़के से ले सकें तथा इसे लेकर उनके मन में कोई अपराध भावना न जन्म ले.
6- एसटीडी (सेक्सुअली ट्रांसमीटेड डिसीज़) से बचाव को लेकर जागरुक हो सकें.
7- आगे चलकर एक सुखद वैवाहिक जीवन जी सकें तथा आदर्श अभिभावक की ज़िम्मेदारी निभाने के लायक बन सकें। 

स्कूलों में सेक्स शिक्षा दी जाए या नहीं-

बच्चों को सेक्स शिक्षा देना बेहद ज़रूरी है, लेकिन स्कूलों में यदि सेक्स शिक्षा दी जाए तो निम्न बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है-

1- सेक्स शिक्षा वही शिक्षक दें, जिनकी इस विषय पर अच्छी पकड़ हो तथा जो बच्चों के सवालों का जवाब वैज्ञानिक तथ्यों के साथ अर्थपूर्ण तरी़के से दे सकें। 
2- प्यूबर्टी पीरियड के शुरू होने से पहले सेक्स शिक्षा दी जाए। 
3- बच्चों को सेक्स शिक्षा देते समय भाषा तथा शब्दों पर विशेष ध्यान दिया जाए। 
4- धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यताओं से परे वैज्ञानिक व सामाजिक मापदंडों को ध्यान में रखकर सेक्स शिक्षा दी जाए। 
5- लड़के-लड़कियों को एक साथ सेक्स शिक्षा दी जाए, ताकि आगे चलकर इस मुद्दे पर बात करते समय वे हिचकिचाएं नहीं। 
6- सेक्स शिक्षा देते समय स्केचेज़, डायग्राम, चार्ट, स्लाइड्स आदि का प्रयोग किया जाए, नग्न तस्वीरों, पोर्नोग्राफ़ी आदि का बिल्कुल भी प्रयोग न हो। 
7- बच्चों को उनके सवाल लिखकर देने का सुझाव भी दें, ताकि बच्चे पूछने से हिचकिचाएं नहीं तथा शिक्षक उनके मन को अच्छी तरह जान-समझ सकें। 
8- सेक्स शिक्षा हमेशा ग्रुप में दी जाए, अकेले नहीं। 

अधिक जानकारी के लिए Dr.B.K.Kashyap से संपर्क करें 9305273775

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